Tuesday, November 22, 2011

sandeh ka badta kahar or swayam ki upyogita


                               संदेह का बढता कहर
जिन्‍दगी में सब कुछ अचानक ही होता है। कल बाजार से लौटी तो पता चला कि मि पटेल ने अपनी पत्‍नी को खूब मारा पूछने पर पता चला कि उन्‍हें शक है कि जब वे आफिस चले जाते हैं तो उनकी पत्‍नी पीछे से किसी अन्‍य युवक को घर बुलाती है। इसलीए उनकी पत्‍नी चरित्रहीन है और वे उसे पीट रहे हैं। मेरे पूछने पर कि आप तो आफिस चले जाते हैं फिर आपको कैसे पता मुझे तो सामनेवाली पडोसन बता रही थी कि तुम्‍हारी पत्‍नी के पास लडके आते हैं। मेरे पूछने पर कि क्‍या आपने अपनी पत्‍नी से इस बारे में बात की कि क्‍या सही है और वो ऐसा क्‍यूं कर रही है। तो पटेलजी बोले हां पर वो इंकार कर रही है कहती है कि 2 4 दिन में कभी उसका चचेरा भाइॅ आ जाता है और कोइॅ नहीं । चचेरे भाइॅ को बुलाया गया और उस बेहतरीन पडोसन से पूछा कि क्‍या यही वो लडका है तो हामी भर दी। क्‍या भाइॅ अपनी बहन के घरमिलने नहीं आ सकता ।भइॅ को लेकर संदेह ।मि पटेल की बात तो आइॅ गयी हो गयी । परन्‍तु सवाल अब भी वही है कि संदेह का कहर क्‍यों ।
                   कहर कइॅ प्रकार के होते हैं मौत का कहर ।आतन्‍कवाद का कहर ।भ्रष्‍टाचार का कहर। लेकिन सबसे जहरीला। कहर तो संदेह का है। यदि संदेह का कहर किसी पर बरस जायेगा तो पूरी जिन्‍दगी तबाह हो सकती है। एक हमारी पडोसन है जिसकी आदत है दूसरों के बारे में अफवाह फैलाना । ऐसी नजर महर द्रष्टि रखती है सब पर कि कइॅयों के घर तुडवा चूकी है। ऐसे में कौन किसे समझाये । क्‍या ये जरूरी नहीं हो जाता कि हम अपने रिश्‍तो की डोरी को मजबूती से बांधे रखें उस पर यकीन करें ताकि दूसरों की क्रपा द्रष्टि के साये से बचाव हो सके। जानलेवा इस संदेह के कहर से बच पाना उतना ही मुश्‍किल है जितना खुद को सुरक्षित रख्‍ पाना ।
                             प्रभाजैन

                     स्‍वंय की उपयोगिता
                                      प्रभाजैन
जीवन सतत खेज की एक अविरल अंजान यात्रा है इसमें जितने उतार चढाव आते हैं । सुख दुख का समन्‍वय होता है उतनी ही अनूभ्‍ज्ञुतियों जन्‍म लेती है। प्रतिक्षण्‍ अनूभव का पुंज ।संभ्‍ज्ञव ये भी है कि अनूभव से आल्‍हाद प्राप्‍त हो। कभी स्रजनात्‍मक मोड। कभी प्रतिकूलता के भाव। दोनों द्धदों के मध्‍य गुजरने पर भी मनुष्‍य के जीवन में एक अभीप्‍सा स्थिर रहती है स्‍वंय के कुछ कर गुजरने की । स्‍वंय की क्‍या उपयोगिता ।परिवार में ।समाज में। देश में। सबसे अधिक वो ,खुद के लिए जरूरी कितना है।
                   आदमी का उत्‍पादन करना एक बात और निष्‍पादित करना दूसरी बात। प्राक्रतिक तरिके से आदमी का उत्‍पादन होता है तय है। किव्‍तू वैज्ञानिक उत्‍पादन का भी अपना महत्‍व है।निमॉण करने में कोइॅ विशेषता नहीं होती किन्‍तु विषेश बात तब होती है जब उसकी उपयोगिता साथॅक हो। मूल्‍य उपयोगी का होता है चाहे वह प्राणी हो अथवा पदाथॅ। एक मां के तीन पुत्र सवॅ्गुण सम्‍पन्‍न परन्‍तु चौथा पुत्र देखने में जितना सुन्‍दर गुण में उतना ही कमजोर। जब उसकी शादी के लिए एक दिन लडकी वाले घर आये तो मां ने कहा मेरा पुत्र सुन्‍दरता में सबसे आगे है लेकिन ये कोइॅ कायॅ नहीं करता ।पढा लिखा नहीं है। अच्‍छी नौकरी भी नहीं। मजदूरी कर नहीं सकता क्‍योंकि ये सुकूमार है। लडकी का पिता कहने लगा हमें अपनी बेटी के लिए मेहनती लडका चाहिए कोइॅ शो पीस नहीं ।
                    निसंदेह जिस व्‍यक्ति के गुण से उसकी श्रेष्‍ठता उसकी उपयोगिता साबित होती है वही श्रेयकर है । स्‍वंय को उपसोगी बनाने के लिए जरूरी है अच्‍छी सोच अच्‍छी जीवन शैली। किसने क्‍या किया क्‍या कर रहा है इन सारे व्‍यथॅ के चिंतन से ज्‍यादा आवश्‍यक करणिय कायॅ है स्‍वंय का चिंतन करना। परिक्रमा स्‍वयं की करनी है।जब तक हम स्‍वयं अपने लिए उपयोगी नहीं बनेगें तो दूसरों के लिए उपयोगिता कहां तक सिद्ध कर पायेगें। सोच हमारी ठंडी होकर उन रास्‍तों को छूने का प्रयास करे जो हमारे व्‍यक्तित्‍व को निखरने में अहम भूमिका निभाये। उग्र दिमाग की सोच यदि लागू की गयी तो सवथॉ अनथॅ व अनिष्‍ट की संज्ञा लेकर सामने आयेगा।
             पश्चिमी रेने देकाते का कथन है------- मैं साचता हूं इसलिए मैं हूं। उन्‍होने सोच को अस्तित्‍व का सूचक मान लिया ।सत्‍य भी है कि सोच हैतभी व्‍यकित की उपयोगिता मुखर होती है।सोचना अच्‍छा है परन्‍तु जरूरी है व्‍यक्तित्‍व * कत्रॅत्‍व और नेत्रत्‍व को उद्रभाषित करने के लिए सही सोच हो जिससे जीवन उपयोगिता का जामा पहनने में कामयाब हो। संदभित सत्‍य है कि दिन का उजाला जितनी देर ठहरता है उतनी ही देर सुनना देखना पढना अच्‍छा लगता है ।सही सेाच के साथ सही उपयोगिता।
                 आज व्‍यक्ति की सेाच इतनी संकीणॅ हो गयी है ।हर मां चाहती है कि देश के लिए भगतसिंह पैदा होने चाहिए परन्‍तु जब खुद के पति व बेटे की बात आती है तब वो सरहद पर उन्‍हें भेजना नहीं चाहती । वो अनोखी मां थी जिसने देश पर अपनी औलादे कुबॉन की है। सोच का पहलू जितना नकारात्‍मक होता है उतना सकारात्‍मक होता नहीं है । सकारात्‍मक चिंतन से ही स्‍वंय की उपयागिता सिद्ध की जा सकती है।
                           

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